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30 साल। 6 जोड़ियाँ। एक डायरी। जोड़ियाँ ऊपर बनती हैं। मिलवाती आशा आंटी हैं।
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पहला पन्ना पढ़िए
किताब 1 · नीमपुर, फागुन 1996
स्टेशन रोड पर बोर्ड सुबह सात बजे लगा।
पेंटर रात भर जागा था। उसकी उँगलियों पर अब भी लाल रंग लगा था। सीढ़ी से उतरकर उसने पूछा, "दीदी, सीधा है न?"
आशा ने सड़क के उस पार जाकर देखा। क्रीम रंग का लकड़ी का बोर्ड। लाल किनारा। बीच में मोटे अक्षर — आशा मैरिज ब्यूरो। नीचे छोटे अक्षरों में — रिश्ते यहाँ बनते हैं।
"सीधा है," उसने कहा। "बस 'यहाँ' ज़रा बड़ा होता, तो बात बन जाती।"
पेंटर ने बोर्ड को देखा। फिर आशा को। "बड़ा करवाना है, तो पैसे अलग लगेंगे, दीदी।"
"तो ऐसे ही बिल्कुल ठीक है।"
वो हँसता हुआ सोने चला गया।
आशा तीस की थी। पेंटर नीमपुर का आख़िरी आदमी था, जिसने उसे दीदी कहा। दोपहर तक पूरा स्टेशन रोड उसे आशा आंटी कहने लगा। उसने किसी को टोका नहीं। रिश्ते की बात दीदी से कौन करता है?
आगे वाला कमरा उसने रात को ही जमा दिया था। स्टील की एक अलमारी, जिसमें अभी एक भी फ़ाइल नहीं थी। एक मेज़। दो कुर्सियाँ इस तरफ़, दो उस तरफ़। छत का पंखा, जो चलते ही चूँ-चूँ करने लगता था। मेज़ पर दो पेन, एक नीला और एक लाल। और लाल कपड़े की जिल्द वाला एक मोटा रजिस्टर।
रजिस्टर नया था, बस पहला पन्ना भरा था। वो पन्ना आशा ने गोंद लगाकर चिपका दिया था। उस पर क्या लिखा है, ये सिर्फ़ उसे पता था।
आठ बजे उसने स्टोव पर चाय चढ़ाई। दो इलायची कूटकर डालीं। फिर दो कप निकाले।
बगल में मुन्ना भैया की साइकिल की दुकान थी। वो पानी का टब लेकर बाहर बैठे थे और पंक्चर ढूँढ रहे थे। उन्होंने खिड़की से झाँका। "दो कप? अभी तो कोई आया भी नहीं।"
एक ही क़स्बा। एक ही मैरिज ब्यूरो। हर दौर में एक नई जोड़ी — और हर बार लाल स्याही में एक लाइन, "मेरी राय"।

1996 · किताब 1
सुधा को अभी शादी नहीं करनी थी। अजय को अमेरिका जाना था। दोनों के घरवाले रिश्ता लेकर आशा आंटी के पास पहुँचे। आशा आंटी ने दोनों को अलग बुलाया और एक ही बात कही — "सगाई कर लो। शादी मत करना।"

2003 · किताब 2
नीमपुर के बाज़ार में मिठाई की दो दुकानें थीं, आमने-सामने। तीस साल से दुश्मनी चल रही थी — किसकी जलेबी असली है। फिर रोहित वापस आया। उसने काव्या की दुकान के ठीक सामने "असली जलेबी" का बोर्ड टाँग दिया। जवाब में आशा आंटी ने दोनों घरों में एक ही रिश्ता भेज दिया।

2009 · किताब 3
पूजा की शादी दुबई वाले लड़के से तय हुई। शादी के दस दिन बाद वो वापस चला गया। फिर शुरू हुईं webcam वाली रातें। समीर हर बार एक ही कमीज़ में दिखता था। पूजा ने आशा आंटी से पूछा — "आंटी, वो इंजीनियर हैं, तो उनके पीछे हर बार एक ही दीवार क्यों होती है?"

2014 · किताब 4
मीनाक्षी जी को दोबारा शादी नहीं करनी थी। ये बात उन्होंने आशा आंटी से नहीं, तन्वी से कही थी। पंद्रह साल की तन्वी ने उसी शाम आशा मैरिज ब्यूरो में अपनी माँ का बायोडाटा जमा कर दिया।

2020 · किताब 5
24 मार्च 2020। रिया का परिवार आदित्य को देखने उसके घर गया। दो घंटे की बात थी। उसी रात lockdown का ऐलान हो गया। अगले 21 दिन दोनों परिवार एक ही घर में बंद रहे। आशा आंटी फ़ोन पर हर शाम पूछती थीं — "आज क्या हुआ?"

2026 · किताब 6
तीस साल में आशा आंटी ने नीमपुर में सैकड़ों रिश्ते जोड़े। अपना कभी नहीं। फिर एक दिन ब्यूरो के दरवाज़े पर रिटायर हो चुके एक मास्टर जी आए, बस एक सवाल लेकर — "मेरी चिट्ठी पढ़ी थी?" और आशा आंटी की मिलवाई पाँचों जोड़ियों ने तय कर लिया — "इस बार रिश्ता हम कराएँगे।"
हर किताब अपने आप में पूरी है। पर पहली पाँच किताबों में आशा आंटी के अपने राज़ का एक-एक टुकड़ा छिपा है। और रजिस्टर के पहले पन्ने पर क्या लिखा है, यह छठी किताब में पता चलता है।
पूरी तरह काल्पनिक
नीमपुर क़स्बा, आशा मैरिज ब्यूरो और उसकी सारी जोड़ियाँ कल्पना हैं। कुछ भी किसी असली इंसान, परिवार या जगह से मिलता-जुलता लगे, तो वह सिर्फ़ संयोग है।
प्यार, पूरी शराफ़त से
यहाँ प्यार नज़रों, नोक-झोंक और थामे हुए हाथों में है। कुछ भी अश्लील नहीं, कोई दोहरे मतलब वाली बात नहीं। किसी भी समुदाय को कहानी की रुकावट, मज़ाक़ या खलनायक नहीं बनाया गया। 13 साल या उससे ऊपर के पाठकों के लिए।
AI की मदद, इंसानी जाँच
कहानियाँ लिखने में हमने AI (कंप्यूटर प्रोग्राम) की मदद ली है, और कवर के चित्र भी AI से बनवाए हैं। हर किताब छपने से पहले हमारी टीम पूरी पढ़ती है और ज़रूरत हो तो सुधारती है।
1996 में आशा आंटी ने स्टेशन रोड पर अपने घर के आगे वाले कमरे के बाहर बोर्ड लगवाया — आशा मैरिज ब्यूरो। मेज़ पर लाल जिल्द वाला एक रजिस्टर। और चाय के हमेशा दो कप। एक अपने लिए। दूसरा उसके लिए, जो अभी दरवाज़े से अंदर नहीं आया।
आशा आंटी का एक ही उसूल है — "मैं बायोडाटा नहीं देखती, आदमी देखती हूँ।" कौन चुपचाप पानी का जग भर देता है। कौन पहले नज़र चुरा लेता है। और वो अक्सर सही निकलती हैं।
1996 — एक नकली सगाई। 2003 — मिठाई की दो दुकानें, और तीस साल पुरानी दुश्मनी। 2009 — दुबई वाला दूल्हा, और webcam वाली रातें। 2014 — बयालीस की उम्र में दूसरा मौक़ा। 2020 — lockdown, और एक ही घर में बंद दो परिवार। 2026 — आख़िरी रिश्ता, और इस बार आशा आंटी का अपना।
दौर बदलते हैं। फ़ोन बदलते हैं। घरवालों की बातें नहीं बदलतीं।
हर किताब अपने आप में पूरी है। एक जोड़ी, एक कहानी, और अंत हमेशा ख़ुशी का। हर किताब रजिस्टर के एक पन्ने से शुरू होती है — लड़का, लड़की, घरवाले क्या चाहते हैं, दोनों क्या चाहते हैं। और ख़त्म होती है लाल स्याही की एक लाइन पर — "मेरी राय"।
पर रजिस्टर का पहला पन्ना आशा आंटी ने गोंद से चिपका रखा है। आज तक किसी को नहीं दिखाया। उस पर क्या लिखा है, यह आपको छठी किताब में पता चलेगा। इसीलिए यह सेट छहों किताबों का है। पाँच जोड़ियाँ पढ़िए, और फिर आशा आंटी की अपनी बारी।
छोटे अध्याय। बोलचाल की हिंदी। हर अध्याय एक मुस्कान या एक सवाल पर रुकता है। साथ में आशा आंटी के रजिस्टर का पन्ना, नीमपुर का नक़्शा, और 30 साल की सूची — कौन, कब, किससे मिला।
पहला अध्याय ऊपर है। पढ़कर देखिए। फिर ख़ुद से पूछिए — आशा आंटी ने दोनों परिवारों को एक ही सुबह, एक ही वक़्त पर क्यों बुलाया?
सैकड़ों रिश्ते जोड़े।

अपना कभी नहीं।
स्टेशन रोड, नीमपुर। आशा मैरिज ब्यूरो, 1996 से।
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