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100 साल। 6 परिवार। एक हवेली। हर परिवार यहाँ से चला गया। पर हर परिवार का एक इंसान आज भी यहीं है।
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पहला पन्ना पढ़िए
किताब 1 · केसरगढ़, कार्तिक 1926
डोली हवेली के फाटक पर रुकी, तो सूरज डूब चुका था।
रुक्मिणी ने घूँघट की ओट से देखा। लाल पत्थर का ऊँचा फाटक। उस पर पीतल की कीलें। और ऊपर, सफ़ेद चूने से लिखा एक अंक — 7।
डोली नीचे रखी गई। न गीत, न आरती। किसी ने उसका हाथ पकड़कर उतारा। हाथ बहुत ठंडा था। किसका था, उसे पता नहीं चला।
अंदर पहला चौक था। फिर एक पतला गलियारा। फिर दूसरा चौक। हर दीवार पर तस्वीरें बनी थीं। हाथी। घोड़े। एक रेलगाड़ी, जिसके धुएँ पर नीला रंग चढ़ा था। बारात में नाचते लोग। छतरी लिए एक अंग्रेज़ साहब।
रुक्मिणी उन्नीस साल की थी। उसने इतना बड़ा घर पहले कभी नहीं देखा था।
"यहाँ इतने लोग रहते हैं?" उसने धीरे से पूछा।
सास आगे-आगे चल रही थीं। उन्होंने मुड़कर नहीं देखा।
"अब नहीं," वो बोलीं।
भीतर वाले चौक के तीन तरफ़ कमरे थे। रुक्मिणी ने घूँघट ज़रा सरकाकर दरवाज़े गिने। एक। दो। तीन। चार। पाँच। छह। शीशम के छह दरवाज़े, नक्काशी वाले।
फिर उसकी नज़र चौथी दीवार पर गई।
वहाँ एक सातवाँ दरवाज़ा था।
एक ही हवेली। हर दौर में एक नया परिवार। और हर बार वही वक़्त — रात 3 बजकर 7 मिनट।

1926 · किताब 1
शादी के बाद रुक्मिणी केसरगढ़ की हवेली में आई। सास ने पहली रात दो नियम बताए। दूसरा था — रात को कोई दरवाज़ा खटखटाए, तो जवाब मत देना। रुक्मिणी ने पूछा, कौन-सा दरवाज़ा? सास ने दीवार की तरफ़ देखा। वहाँ एक दरवाज़ा बना था। रंग से।

1947 · किताब 2
14 अगस्त 1947 की रात। पूरा केसरगढ़ आज़ादी की ख़बर का इंतज़ार कर रहा था। हवेली नंबर 7 में पोस्टमास्टर का रेडियो बजा। पर आवाज़ किसी और की थी। एक औरत की। वो बार-बार उनके बेटे मोहन का नाम ले रही थी।

1975 · किताब 3
मदनलाल का फ़ोटो स्टूडियो हवेली के आगे वाले कमरे में था। घर के 6 लोग फ़ोटो के लिए खड़े हुए। फ़ोटो धुलकर आई, तो उसमें 7 चेहरे थे। और सातवाँ चेहरा हर नई फ़ोटो में थोड़ा और पास आ जाता था।

1999 · किताब 4
हवेली के आगे सुनील का पीला STD booth था। उस शाम सड़क की खुदाई में फ़ोन की लाइन कट गई। रात 3 बजकर 7 मिनट पर फ़ोन फिर भी बजा। उधर से आवाज़ आई — "पिंकी से बात करवा दो।"

2012 · किताब 5
रोहित और अनन्या ने हवेली को homestay बना दिया। 6 कमरे। पर booking website पर 7 कमरे दिखते थे। कमरा नंबर 7 हर रात book होता था। और हर रात कोई मेहमान उसे ढूँढता हुआ भीतर वाले चौक तक आ जाता था।

2026 · किताब 6
तारा हवेली बेचने आई थी। साथ में दो YouTubers थे। उन्हें हवेली से live करना था। 40,000 लोग देख रहे थे। रात 3 बजकर 7 मिनट पर comments में सब एक ही बात लिखने लगे — "तुम्हारे पीछे कौन है?"
हर किताब अपने आप में पूरी है। पर हर किताब के बाद हवेली की दीवार पर एक तस्वीर जुड़ जाती है — और छठी किताब में पता चलता है, क्यों।
पूरी तरह काल्पनिक
केसरगढ़ क़स्बा, हवेली नंबर 7, उसके परिवार और हवेली से जुड़ी हर घटना कल्पना है। किसी असली इंसान, परिवार या जगह से कोई समानता सिर्फ़ संयोग है।
डर भरपूर, ख़ून-ख़राबे के दृश्य नहीं
रात का सन्नाटा, रहस्य और डर। कुछ भी अश्लील नहीं, किसी धर्म, जाति या समाज का मज़ाक़ नहीं। यह भूतों की कहानी है, मनोरंजन के लिए। हम झाड़-फूँक या टोने-टोटके को सही नहीं ठहराते। 13 साल या उससे ज़्यादा उम्र के पाठकों के लिए।
AI की मदद, इंसानी जाँच
कहानियाँ लिखने में हमने AI (कंप्यूटर प्रोग्राम) की मदद ली है, और कवर के चित्र भी AI से बनवाए हैं। हर किताब छपने से पहले हमारी टीम पूरी पढ़ती है और ज़रूरत हो तो सुधारती है।
शेखावाटी की पुरानी हवेलियों की दीवारों पर तस्वीरें बनी होती हैं। हाथी, घोड़े, रेलगाड़ियाँ, बारातें। केसरगढ़ की हवेली नंबर 7 में भी हैं।
पर इस हवेली की दीवार पर एक दरवाज़ा भी बना है। सिर्फ़ रंग से बना, असली नहीं। और 100 साल से, रात 3 बजकर 7 मिनट पर, कोई उसे अंदर से खटखटाता है।
केसरगढ़ के लोग कहते हैं, सेठ गिरधारीलाल ने मरते वक़्त उसी दरवाज़े पर हाथ रखा था। उनकी आख़िरी बात थी — "इस हवेली से अब कोई नहीं जाएगा।"
तब से 6 परिवार यहाँ रहे। परिवार चले गए। पर हर परिवार का कोई एक आज भी यहीं है।
1926 में दस्तक सुनाई देती है, लालटेन की रोशनी में। 1947 में आज़ादी की रात, एक रेडियो से। 1975 में एक फ़ोटो से, जिसमें एक चेहरा ज़्यादा है। 1999 में STD booth के फ़ोन से। 2012 में एक website से। और 2026 में, 40,000 लोगों के सामने, एक live stream पर।
दौर बदलते हैं। चीज़ें बदलती हैं। वक़्त नहीं बदलता।
हर किताब अपने आप में पूरी है। उसका अपना परिवार, अपना डर, अपना अंत।
पर हर किताब के आख़िर में हवेली की दीवार पर एक तस्वीर जुड़ जाती है। पाँचवीं किताब तक आप समझने लगते हैं कि ये तस्वीरें किसकी हैं। पूरा राज़ छठी किताब में खुलता है। इसलिए हम छहों किताबें एक साथ भेजते हैं, ताकि पाँचवीं के बाद आपको छठी के लिए रुकना न पड़े।
छोटे अध्याय। बोलचाल की हिंदी। हर अध्याय एक सवाल पर रुकता है, ताकि आप अगला पन्ना पलटें। साथ में हवेली का नक़्शा, और 100 साल का ब्योरा — कौन, कब, किस कमरे में रहा।
ऊपर पहला पन्ना है। पढ़कर देखिए। फिर ख़ुद से पूछिए — रात 3 बजकर 7 मिनट पर कोई अंदर से दरवाज़ा खटखटाए और आपका नाम ले, तो क्या आप जवाब देंगे?
हर परिवार यहाँ से चला गया।

पर हर परिवार का एक इंसान आज भी यहीं है।
हवेली की दीवार पर बना दरवाज़ा, और उसके आस-पास की तस्वीरें। हर किताब के बाद इनमें एक तस्वीर जुड़ जाती है।
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