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रोज़ का हिसाब नहीं। साल में एक बार अपने दस नियम लिखिए, और हर महीने बीस मिनट बैठकर देखिए कि पैसा कहाँ गया। उधार, सोना, कमेटी, बीमा, नॉमिनी और टैक्स की तारीख़ें — घर के पैसे की हर बात एक किताब में।



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शुरू के पन्ने एक बार, फिर बारह महीने, हर तीन महीने पर एक बैठक, और आख़िर में पूरा साल।
महीनों के नाम छपे नहीं हैं — ’महीना 1, महीना 2…’। जिस महीने से चाहें, शुरू कीजिए।
जिनके घर में पैसा आता है, जाता है, और महीने के आख़िर में हिसाब नहीं मिलता।
सैलरी आती है, EMI और फ़ीस जाती है, और 25 तारीख़ तक जेब ख़ाली। अब हर महीने पता रहेगा कि पैसा कहाँ गया।
महीने की पहली तारीख़ को एक साथ बैठिए। तिमाही में घर की पैसा-बैठक का अपना पन्ना है।
FD, सोना, कमेटी, बीमा, किसी को दिया उधार — सब एक किताब में, किसके नाम और कहाँ।
रोज़ कुछ नहीं लिखना। महीने में एक बार, बीस मिनट। छूट जाए, तो अगले महीने वहीं से।

महीने की 25 तारीख़ आते-आते जेब ख़ाली। सैलरी आई, EMI गई, फिर राशन, फ़ीस, किसी को उधार… और बचत का खाना फिर ख़ाली। ज़्यादातर लोग इसके लिए ख़र्च की डायरी शुरू करते हैं, और तीसरे हफ़्ते में छोड़ देते हैं। रोज़ की हर चाय लिखना किसी से नहीं होता।
यह प्लानर वह माँगता ही नहीं। आप साल में एक बार अपने नियम लिखते हैं, और महीने में एक बार बीस मिनट बैठते हैं। किताब का पहला वादा यही है: “नियम एक बार, हिसाब महीने में एक बार। रोज़ का कुछ नहीं।”
महीने की पहली तारीख़ को एक पन्ने पर योजना: कितना आना है, कौन-से बड़े ख़र्च आने हैं, और इस महीने किस नियम पर ध्यान रहेगा। महीने के आख़िर में बाक़ी पन्ने, बैंक और UPI की लिस्ट सामने रखकर।
किताब कोई नियम नहीं थोपती। पहले वह दिखाती है कि अच्छा नियम कैसा होता है — छोटा, साफ़, और उसमें एक नंबर या एक तारीख़। जैसे किताब का एक नमूना: “₹2,000 से ऊपर की कोई भी ख़रीद, तीन दिन रुककर।” फिर दस नियम आप ख़ुद लिखते हैं, और हर महीने एक पन्ने पर देखते हैं कि कौन-सा टिका और कौन-सा टूटा।
मुश्किल पलों के लिए भी पहले से नियम: जब कोई रिश्तेदार उधार माँगे, जब कोई पॉलिसी बेचने घर आए, जब कोई 'पैसा दोगुना' कहे। उस पल में सोचना नहीं पड़ता, क्योंकि आपने पहले ही लिख रखा है।
भारत के घर में पैसा सिर्फ़ बैंक में नहीं होता। वह रिश्तेदार के पास उधार में होता है, अलमारी में सोने के रूप में, मोहल्ले की कमेटी में, और शादी-ब्याह के व्यवहार में। ये सब इस किताब में अपनी-अपनी जगह पर हैं — उधार रजिस्टर, सोना-चाँदी, कमेटी की किस्तें, व्यवहार में दिया और मिला, और दूध, अख़बार, काम वाली का महीने का हिसाब भी।
ज़रूरी काग़ज़ कहाँ रखे हैं और घर में किसे पता है। हर खाते और बीमे में नॉमिनी है या नहीं। और एक पन्ना, जिसका नाम है “अगर मुझे कुछ हो जाए” — ताकि मुसीबत के दिन किसी को भटकना न पड़े। पूरा खाता नंबर, PIN या पासवर्ड लिखने की जगह कहीं नहीं है, जानबूझकर।
हर महीने के चार नंबर — आया, गया, बचा, कर्ज़ बाक़ी — साल के आख़िर में एक पन्ने पर आ जाते हैं। फिर एक पन्ना पिछले साल से तुलना का। पहले साल वह खाना ख़ाली रहता है, और अगले साल इसी किताब के नंबर 'पिछला साल' बनते हैं।
इस किताब में कोई निवेश, बीमा या टैक्स की सलाह नहीं है। किताब के अपने शब्दों में: “यह किताब आपकी अपनी योजना लिखने के लिए है — निवेश, बीमा या टैक्स की सलाह देने के लिए नहीं।”
निवेश की सलाह नहीं
किसी फ़ंड, शेयर, बैंक या पॉलिसी का नाम नहीं, किसी कमाई का वादा नहीं। नियम आप लिखते हैं।
रोज़ का ख़र्च-रजिस्टर नहीं
हर चाय नहीं लिखनी। महीने में एक बार, हिस्सों में हिसाब।
ऐप नहीं, किताब
काग़ज़ और पेन। कोई लॉगिन नहीं — और पासवर्ड या PIN लिखने की जगह कहीं नहीं।
अंदर रंगीन नहीं
कवर रंगीन है। अंदर के पन्ने काले-सफ़ेद हैं, लिखने के लिए।
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